कथाओ मैं
कहा
शिव के वाराणसी छोड़ने के पीछे एक सुन्दर कथा है। शिव को कुछ राजनीतिक कारणों की वजह से काशी छोड़ना पड़ा। हां, यह सच है। देवोदास नाम का एक राजा था। वह एक बहुत ही प्रभावशाली राजा था।
देवताओं को डर था कि अगर वाराणसी का ठीक से ध्यान नहीं रखा गया, तो उसकी ऊर्जा नष्ट हो जाएगी। इसलिए उन्होंने देवोदास से काशी का राजा बनने को कहा। लेकिन देवोदास ने एक शर्त रख दी – ‘मैं राजा तभी बनूँगा, जब शिव काशी छोड़ कर चले जाएं। अगर शिव यहीं रहते हैं, तो मेरे राजा बनने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि लोग शिव के ही पास जाएंगे। और मैं यहां महल में बैठा रहूंगा – यह किस तरह का राजा हुआ? शिव को तो काशी से जाना ही होगा।’ इस पर शिव पार्वती के साथ मंदार पर्वत पर रहने चले गए। वे वहां गए, लेकिन वहां रह नहीं पाए, वे काशी वापस आना चाहते थे, लेकिन यह राजनीतिक शर्त थी कि वे काशी वापस नहीं आ सकते थे। इसलिए उन्होंने कहा, ‘इस दिवोदास को बाहर निकालो, मैं वहां वापस जाना चाहता हूं।’ इसलिए उन्होंने 64 योगिनियों को वहां भेजा और कहा, ‘किसी तरह उस राजा को पथभ्रष्ट करो।’ एक बार हमें उसमें कोई खोट मिल गयी तो फिर हम उसे अपना बोरिया बिस्तर समेट कर वहां से जाने के लिए कह सकते हैं। और फिर मैं वापस आ जाऊंगा।’ योगिनियां आईं और काशी के समाज में पूरी तरह से फैल गईं। वे समाज को भ्रष्ट करना चाहती थीं, लेकिन उन्हें वह जगह इतनी भा गई, कि वे अपना मकसद ही भूल गयीं और वहां से वापस नहीं गईं। उसके बाद शिव ने सूर्य देव को भेजा। सूर्य को भी वह जगह ऐसी पसंद आई कि वह भी वापस नहीं गए। काशी के सभी सूर्य या आदित्य मंदिर उन्हीं के लिए बने हैं।
उसके बाद शिव ने ब्रह्मा को भेजा। ब्रह्मा खुद आये और उन्हें भी वह जगह पसंद आ गयी, और वे वापस नहीं गए। तब शिव ने कहा – ‘मैं इनमें से किसी पर विश्वास नहीं कर सकता’ और फिर शिव ने अपने गणों को भेजा। वे शिव को कभी भूल नहीं सकते, क्योंकि वे शिव के अत्यंत प्रिय हैं। लेकिन उनको यह जगह इतनी पसंद आई कि उन्होंने बोला शिव को सिर्फ इसी जगह रहना चाहिए। उन्हें मंदार पर्वत पर नहीं रहना चाहिए। और फिर वे वाराणसी के द्वार-पाल बन गए। उन्होंने कहा – ‘वैसे भी शिव को तो यहां आना ही है, अब हम वापस जा कर क्या करेंगे।’
उसके बाद दिवोदास को मुक्ति का लालच दिया गया। उन्होंने कई तरह के लालच देकर देवोदास को भ्रष्ट करना चाहा, लेकिन वे उसे भ्रष्ट नहीं कर पाए। दिवोदास भ्रष्ट हो जाने वालों में से नहीं था। लेकिन मुक्ति का लालच दिए जाने पर वह मान गया। उसके बाद शिव वाराणसी वापस आ गए।
इसलिए, वाराणसी में अविमुक्तेश्वर नामक का एक मंदिर है। क्योंकि शिव ने वचन दिया था, ‘चाहे कुछ भी हो जाए, मैं वाराणसी छोड़कर नहीं जाऊंगा।’
कहा
शिव के वाराणसी छोड़ने के पीछे एक सुन्दर कथा है। शिव को कुछ राजनीतिक कारणों की वजह से काशी छोड़ना पड़ा। हां, यह सच है। देवोदास नाम का एक राजा था। वह एक बहुत ही प्रभावशाली राजा था।
देवताओं को डर था कि अगर वाराणसी का ठीक से ध्यान नहीं रखा गया, तो उसकी ऊर्जा नष्ट हो जाएगी। इसलिए उन्होंने देवोदास से काशी का राजा बनने को कहा। लेकिन देवोदास ने एक शर्त रख दी – ‘मैं राजा तभी बनूँगा, जब शिव काशी छोड़ कर चले जाएं। अगर शिव यहीं रहते हैं, तो मेरे राजा बनने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि लोग शिव के ही पास जाएंगे। और मैं यहां महल में बैठा रहूंगा – यह किस तरह का राजा हुआ? शिव को तो काशी से जाना ही होगा।’ इस पर शिव पार्वती के साथ मंदार पर्वत पर रहने चले गए। वे वहां गए, लेकिन वहां रह नहीं पाए, वे काशी वापस आना चाहते थे, लेकिन यह राजनीतिक शर्त थी कि वे काशी वापस नहीं आ सकते थे। इसलिए उन्होंने कहा, ‘इस दिवोदास को बाहर निकालो, मैं वहां वापस जाना चाहता हूं।’ इसलिए उन्होंने 64 योगिनियों को वहां भेजा और कहा, ‘किसी तरह उस राजा को पथभ्रष्ट करो।’ एक बार हमें उसमें कोई खोट मिल गयी तो फिर हम उसे अपना बोरिया बिस्तर समेट कर वहां से जाने के लिए कह सकते हैं। और फिर मैं वापस आ जाऊंगा।’ योगिनियां आईं और काशी के समाज में पूरी तरह से फैल गईं। वे समाज को भ्रष्ट करना चाहती थीं, लेकिन उन्हें वह जगह इतनी भा गई, कि वे अपना मकसद ही भूल गयीं और वहां से वापस नहीं गईं। उसके बाद शिव ने सूर्य देव को भेजा। सूर्य को भी वह जगह ऐसी पसंद आई कि वह भी वापस नहीं गए। काशी के सभी सूर्य या आदित्य मंदिर उन्हीं के लिए बने हैं।
उसके बाद शिव ने ब्रह्मा को भेजा। ब्रह्मा खुद आये और उन्हें भी वह जगह पसंद आ गयी, और वे वापस नहीं गए। तब शिव ने कहा – ‘मैं इनमें से किसी पर विश्वास नहीं कर सकता’ और फिर शिव ने अपने गणों को भेजा। वे शिव को कभी भूल नहीं सकते, क्योंकि वे शिव के अत्यंत प्रिय हैं। लेकिन उनको यह जगह इतनी पसंद आई कि उन्होंने बोला शिव को सिर्फ इसी जगह रहना चाहिए। उन्हें मंदार पर्वत पर नहीं रहना चाहिए। और फिर वे वाराणसी के द्वार-पाल बन गए। उन्होंने कहा – ‘वैसे भी शिव को तो यहां आना ही है, अब हम वापस जा कर क्या करेंगे।’
उसके बाद दिवोदास को मुक्ति का लालच दिया गया। उन्होंने कई तरह के लालच देकर देवोदास को भ्रष्ट करना चाहा, लेकिन वे उसे भ्रष्ट नहीं कर पाए। दिवोदास भ्रष्ट हो जाने वालों में से नहीं था। लेकिन मुक्ति का लालच दिए जाने पर वह मान गया। उसके बाद शिव वाराणसी वापस आ गए।
इसलिए, वाराणसी में अविमुक्तेश्वर नामक का एक मंदिर है। क्योंकि शिव ने वचन दिया था, ‘चाहे कुछ भी हो जाए, मैं वाराणसी छोड़कर नहीं जाऊंगा।’







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